आमोद कुमार
बांदा के बिसंडा क्षेत्र में 27 मई को हुई दर्दनाक घटना केवल एक सड़क दुर्घटना नहीं, बल्कि प्रशासनिक उदासीनता, अवैध खनन और ओवरलोड परिवहन के उस खतरनाक गठजोड़ की भयावह परिणति है, जिसकी चेतावनी वर्षों से दी जाती रही है। एक ही दिन में सात लोगों की मौत और कई लोगों का घायल होना इस बात का प्रमाण है कि जब कानून कमजोर पड़ता है, तो सड़कों पर मौत बेलगाम दौड़ने लगती है।
कांग्रेस जिलाध्यक्ष राजेश दीक्षित द्वारा पीड़ित परिवारों से मुलाकात के दौरान उठाए गए सवालों को केवल राजनीतिक बयान मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, ओवरलोड बालू से भरा ट्रक पहले ग्राम घूरी निवासी सेवानिवृत्त शिक्षक रामेश्वर प्रसाद अनुरागी को कुचलता है और फिर बिसंडा कस्बे में एक ई-रिक्शा को रौंद देता है। इस भयावह हादसे में सोहन पुत्र रामलाल, राकेश पुत्र लोटन, ममता पत्नी मुन्ना श्रीवास, नवीन पुत्र शरीफ, शहबाज पुत्र शेरू और साफिया पुत्री शेरू समेत सात लोगों की जान चली गई।सवाल केवल चालक की लापरवाही का नहीं है। असली प्रश्न यह है कि आखिर इतने भारी और ओवरलोड वाहन किसकी निगरानी में सड़कों पर दौड़ रहे हैं? यदि उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश से अवैध एवं ओवरलोड बालू का परिवहन लगातार हो रहा है, तो संबंधित विभागों, परिवहन तंत्र और खनन निगरानी व्यवस्था की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय के निर्देश पर पहुंचे प्रतिनिधिमंडल ने पीड़ित परिवारों को न्याय का भरोसा दिलाया। लेकिन यह त्रासदी केवल राजनीतिक संवेदना का विषय नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी है। यदि अवैध खनन और ओवरलोडिंग पर समय रहते प्रभावी नियंत्रण किया गया होता, तो संभव है कि सात परिवार आज अपनों के शोक में न डूबे होते।बालू का कारोबार आज केवल आर्थिक गतिविधि नहीं रह गया है। यह कई क्षेत्रों में कानून, पर्यावरण और मानव जीवन को चुनौती देने वाला तंत्र बन चुका है। नदियों का दोहन, सड़कों का क्षरण और दुर्घटनाओं में बढ़ोतरी इसके प्रत्यक्ष परिणाम हैं। विडंबना यह है कि हर बड़े हादसे के बाद सख्ती की घोषणाएं होती हैं, लेकिन कुछ समय बाद वही ओवरलोड वाहन फिर सड़कों पर दिखाई देने लगते हैं।पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने के लिए केवल मुआवजा पर्याप्त नहीं होगा। जरूरत इस बात की है कि ट्रक मालिकों, खनन माफियाओं, परिवहन नियमों का उल्लंघन करने वालों और यदि कहीं प्रशासनिक लापरवाही हुई है तो उसके जिम्मेदार लोगों के खिलाफ भी कठोर कार्रवाई हो। क्योंकि जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसी घटनाएं दोहराई जाती रहेंगी।बिसंडा की सड़क पर बहा खून आज भी एक सवाल पूछ रहा है—क्या सात मौतें भी व्यवस्था को झकझोरने के लिए पर्याप्त नहीं हैं? यदि अब भी अवैध खनन और ओवरलोडिंग के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई नहीं हुई, तो यह हादसा केवल एक दुखद स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य की अनेक त्रासदियों की चेतावनी साबित होगा।
