आमोद कुमार
बांदा, 11 जून। विकास की दौड़ में प्रकृति अक्सर सबसे बड़ी कीमत चुकाती है। नदियों की रेत, पहाड़ों के पत्थर और धरती की गहराइयों से निकाले गए उपखनिज जहां आर्थिक गतिविधियों को गति देते हैं, वहीं पर्यावरण पर उनका प्रभाव भी उतना ही गहरा होता है। इसी संतुलन को साधने की दिशा में बांदा प्रशासन ने एक महत्वपूर्ण पहल की है।अपर जिलाधिकारी (वि०/रा०) कुमार धर्मेंद्र की अध्यक्षता में आयोजित बैठक में जनपद के सभी खनन पट्टाधारकों, अनुज्ञाधारकों और क्रेशर स्वामियों को स्पष्ट संदेश दिया गया कि खनन केवल संसाधनों के दोहन का माध्यम नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व का भी विषय है। वन विभाग की शर्तों और पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप जुलाई और अगस्त में व्यापक वृक्षारोपण अभियान चलाया जाएगा।योजना के तहत खनन क्षेत्रों और 50 तालाबों के आसपास लगभग 30 हजार पौधे लगाए जाएंगे। यह संख्या केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि उस हरित भविष्य का संकेत है जिसकी आज सबसे अधिक आवश्यकता महसूस की जा रही है। फलदार पौधों के चयन और उनकी सुरक्षा के लिए फेंसिंग की व्यवस्था इस बात का प्रमाण है कि प्रशासन केवल पौधे लगाने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि उन्हें वृक्ष बनने तक संरक्षित रखने का भी इच्छुक है।बैठक में कुछ पट्टाधारकों ने भूमि उपलब्धता की समस्या रखी, लेकिन प्रशासन ने समाधान का रास्ता भी दिखाया। स्पष्ट किया गया कि यदि पट्टा क्षेत्र के आसपास भूमि उपलब्ध नहीं है तो तहसील प्रशासन आवश्यक भूमि उपलब्ध कराने में सहयोग करेगा। यह निर्णय दर्शाता है कि पर्यावरण संरक्षण की राह में बहानों के लिए नहीं, बल्कि समाधान के लिए जगह है।
अपर जिलाधिकारी ने विशेष रूप से इस बात पर बल दिया कि वृक्षारोपण का वास्तविक अर्थ केवल पौधा रोप देना नहीं, बल्कि उसकी देखभाल कर उसे जीवित रखना है। यही कारण है कि पौधों की सुरक्षा और संरक्षण की जिम्मेदारी सीधे पट्टाधारकों को सौंपी गई है।, क्योंकि जिस क्षेत्र में खनन गतिविधियां संचालित होती हैं, वहां पर्यावरणीय क्षति की भरपाई का दायित्व भी संबंधित संचालकों पर ही होना चाहिए।
वन विभाग द्वारा पौधों की उपलब्धता सुनिश्चित करने का आश्वासन इस अभियान को और मजबूत आधार प्रदान करता है। यदि प्रशासनिक इच्छाशक्ति, वन विभाग का सहयोग और पट्टाधारकों की जवाबदेही एक साथ कायम रही, तो यह पहल केवल औपचारिकता बनकर नहीं रह जाएगी।दरअसल, वृक्ष केवल छाया या फल नहीं देते, वे भविष्य को सांस लेने की क्षमता भी देते हैं। बांदा में शुरू हुआ यह अभियान उसी सोच का विस्तार है, जहां खनन से निकली रिक्तता को हरियाली से भरने का प्रयास किया जा रहा है। आने वाला समय बताएगा कि यह संकल्प कितनी मजबूती से जमीन पर उतरता है, लेकिन फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि प्रकृति और विकास के बीच संतुलन बनाने की दिशा में यह एक सार्थक कदम है।
