भ्रष्टाचार का गढ़ बना सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र रिसिया, बहराइच — अधीक्षक व डॉक्टरों पर गंभीर आरोप, गरीब मरीजों को महंगी बाहर की दवाइयां खरीदने को किया जा रहा मजबूर
बहराइच (उत्तर प्रदेश) — जनपद बहराइच के विकासखंड रिसिया स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र (CHC रिसिया) में भ्रष्टाचार और मनमानी का एक बड़ा मामला उजागर हुआ है। यहां तैनात अधीक्षक और कुछ डॉक्टरों पर यह आरोप है कि वे मरीजों को सरकारी दवाइयां देने की बजाय जानबूझकर बाहर की महंगी दवाइयां लिख रहे हैं, जिससे गरीब और मध्यमवर्गीय मरीजों पर आर्थिक बोझ बढ़ता जा रहा है।
यह मामला तब प्रकाश में आया जब स्थानीय निवासी लालू उर्फ अनिल मिश्रा (निवासी: रिसिया बाजार) ने स्थानीय पत्रकार अदहम खान को फोन पर बताया कि अस्पताल के अधीक्षक ने स्वयं उनसे कहा कि “सरकारी दवाइयां उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए बाहर की दवाइयां खरीदनी होंगी।” पीड़ित मरीज ने बताया कि उसने 1886 रुपये की दवाइयां बाहर से खरीदीं।
1. सरकारी आदेशों की खुली अवहेलना
प्रदेश सरकार व स्वास्थ्य विभाग की ओर से स्पष्ट निर्देश जारी किए गए हैं कि किसी भी सरकारी अस्पताल में बाहर की दवाइयां लिखना प्रतिबंधित है। यदि किसी दवा की तत्काल आवश्यकता हो, तो अधीक्षक को अपने फंड से खरीदकर मरीजों को निःशुल्क उपलब्ध करानी चाहिए।
लेकिन सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र रिसिया में यह निर्देश पूरी तरह से ध्वस्त हो चुके हैं। डॉक्टरों की मनमानी, अधीक्षक की उदासीनता और प्रशासनिक लापरवाही ने इस स्वास्थ्य केन्द्र को भ्रष्टाचार का केन्द्र बना दिया है।
2. पर्चों में उजागर हुआ भ्रष्टाचार का सबूत
मरीजों द्वारा साझा की गई तस्वीरों और पर्चों में स्पष्ट देखा जा सकता है कि डॉक्टरों द्वारा दो प्रकार के पर्चे दिए जा रहे हैं —
पहला: सरकारी पर्चा, जिसमें कुछ सामान्य दवाइयां लिखी हैं।
दूसरा: बाहरी मेडिकल स्टोर का पर्चा, जिसमें महंगी ब्रांडेड दवाइयां लिखी जाती हैं।
इससे यह संदेह और भी गहरा हो जाता है कि अस्पताल के कुछ डॉक्टर और स्थानीय मेडिकल स्टोरों के बीच कमीशन आधारित गठजोड़ चल रहा है।
3. गरीबों के इलाज पर संकट
स्थानीय नागरिकों ने बताया कि अस्पताल प्रशासन का यह रवैया गरीब मरीजों के साथ अन्याय है। कई लोग ऐसे हैं जो रोज़मर्रा की मजदूरी पर निर्भर हैं, और जिनके लिए 1000-1500 रुपये की दवाइयां खरीदना असंभव है।
रिसिया बाजार निवासी रामविलास ने कहा —
“हम अस्पताल इलाज कराने जाते हैं क्योंकि वहां मुफ्त दवाइयां मिलती हैं। लेकिन यहां तो डॉक्टर बाहर की दवाइयां लिख देते हैं। हमारे पास पैसे नहीं रहते, तो इलाज अधूरा छोड़ना पड़ता है।”
इस तरह की घटनाएं न केवल सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठाती हैं बल्कि यह भी दिखाती हैं कि किस तरह सरकारी संस्थानों में गरीबों की मजबूरी को आय का जरिया बना लिया गया है।
4. अंदरखाने की कहानी — ‘कमीशन का खेल’
स्थानीय सूत्रों का कहना है कि सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र रिसिया में कुछ डॉक्टरों और आसपास की मेडिकल दुकानों के बीच कमीशन सिस्टम चल रहा है। मरीजों को उसी दुकान का नाम बताया जाता है जहां डॉक्टरों का हिस्सा तय होता है।
एक स्थानीय व्यक्ति ने नाम न छापने की शर्त पर बताया —
“यहां अगर कोई बाहर की दवा नहीं खरीदता तो इलाज में टालमटोल की जाती है। जो बाहर से दवा ले आता है, उसका इलाज तुरंत हो जाता है। सबकुछ सांठगांठ से चल रहा है।”
5. प्रशासनिक लापरवाही और निगरानी की कमी
इस गंभीर प्रकरण के बावजूद जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी अब तक मौन हैं। यह सवाल उठता है कि जब यह मामला आम जनता तक पहुंच गया, तो मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) बहराइच ने अब तक जांच क्यों नहीं कराई?
रिसिया स्वास्थ्य केन्द्र में दवा भंडारण, स्टॉक रजिस्टर और वितरण की पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
6. शासन की नीति बनाम जमीनी हकीकत
उत्तर प्रदेश सरकार लगातार यह दावा करती रही है कि प्रदेश के सभी सरकारी अस्पतालों में निःशुल्क इलाज व दवाइयों की व्यवस्था है। इसके लिए करोड़ों रुपये का बजट हर साल जारी किया जाता है।
लेकिन रिसिया जैसे स्वास्थ्य केन्द्रों की हकीकत इन दावों को झुठलाती है। यहां नीति और अमल के बीच गहरी खाई दिख रही है।
7. जनता की मांग — निष्पक्ष जांच और कार्रवाई
स्थानीय नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों ने मांग की है कि इस मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और दोषी डॉक्टरों व अधीक्षक के खिलाफ कड़ी विभागीय कार्रवाई की जाए।
उन्होंने कहा कि यदि यह मामला बिना कार्रवाई के दबा दिया गया तो इससे पूरे जिले के सरकारी स्वास्थ्य केन्द्रों पर जनता का विश्वास खत्म हो जाएगा।
8. प्रमुख सवाल जो जांच का विषय हैं
सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र रिसिया में सरकारी दवाइयां नियमित रूप से उपलब्ध हैं या नहीं?
अधीक्षक ने दवा फंड से कितनी खरीददारी की और उसका रिकॉर्ड कहां है?
मरीजों को बाहर की दवाइयां लिखने का आदेश किसने दिया?
क्या मेडिकल स्टोर्स से किसी प्रकार का कमीशन लिया जा रहा है?
CMO और जिला प्रशासन ने इस विषय पर अब तक क्या कार्रवाई की है?
9. आम जनता का संदेश
रिसिया की जनता का कहना है कि यह मामला किसी एक अस्पताल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे सरकारी स्वास्थ्य तंत्र की व्यवस्थित लापरवाही को उजागर करता है।
जब सरकारी दवाइयां गोदामों में पड़ी रहती हैं और मरीजों को बाहर की दवाइयां लिखी जाती हैं, तो यह सीधे-सीधे जनधन की लूट है।
संतोष कुमार (सामाजिक कार्यकर्ता) ने कहा —
“सरकार गरीबों के इलाज के लिए दवाइयां भेजती है, लेकिन भ्रष्ट अधिकारी और डॉक्टर उसे अपनी कमाई का जरिया बना लेते हैं। अगर यह मामला दबा दिया गया तो जनता सड़कों पर उतरेगी।”
10. निष्कर्ष
सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र रिसिया में उजागर हुआ यह प्रकरण यह साबित करता है कि सरकारी अस्पतालों में भ्रष्टाचार और गैर-जवाबदेही ने जनता का भरोसा तोड़ दिया है।
यह केवल एक स्वास्थ्य केन्द्र का मामला नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल है।
यदि इस मामले की उच्चस्तरीय जांच नहीं कराई गई, तो सरकार के “स्वास्थ्य सेवाएं सबके लिए” जैसे दावे केवल नारे बनकर रह जाएंगे।
मांगें (Demand):
रिसिया सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र के अधीक्षक को तत्काल निलंबित किया जाए।
सभी डॉक्टरों के पर्चों की जांच हेतु विशेष टीम गठित की जाए।
दवा स्टॉक व वितरण रजिस्टर को सार्वजनिक किया जाए।
कमीशनखोरी में लिप्त मेडिकल स्टोरों के लाइसेंस रद्द किए जाएं।
पीड़ित मरीजों को आर्थिक सहायता दी जाए और दवाइयां निःशुल्क उपलब्ध कराई जाएं।

