प्रेस विज्ञप्ति
साधना और आत्मज्ञान के महापर्व के रूप में मनाई गई आचार्य तारण स्वामी जी की जयंती
अमोद कुमार
बांदा आए जैन संत बाल ब्रह्मचारी श्री शांतानंद महाराज जी ने आचार्य प्रवर तारण स्वामी के बारे मे बताया कि
जैन धर्म के महान संत, प्रखर साधक एवं तारण पंथ के प्रवर्तक आचार्य भगवान तारण स्वामी जी की जयंती गुरुवार, 27 नवंबर को देशभर में श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ मनाई गई। तारण जयंती के अवसर पर विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान, प्रवचन, भक्ति कार्यक्रम तथा सेवा गतिविधियों का आयोजन किया गया। यह पर्व लगभग सात दिनों तक विभिन्न कार्यक्रमों के साथ मनाया जाता है।15वीं–16वीं शताब्दी में जैन जगत को आत्मज्ञान की नई दिशा देने वाले आचार्य तारण स्वामी जी का जन्म संवत 1505 (सन 1448) में प्राचीन नगरी पुष्पावती बिलहरी, जिला कटनी (मध्य प्रदेश) में हुआ था। उनके पिता दीवान गढ़ाशाह एवं माता वीरश्री देवी थीं। बाल्यकाल से ही तीक्ष्ण बुद्धि और विलक्षण प्रतिभा के धनी तारण स्वामी जी को मात्र 11 वर्ष की आयु में सम्यक दर्शन की आत्मानुभूति हो गई थी। 21 वर्ष की आयु में उन्होंने बाल ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर कठोर साधना का मार्ग अपनाया।आचार्य तारण स्वामी जी ने जीवन भर संसार के भोग-विलास से मुक्त होकर आत्मा के शाश्वत सुख और शांति की अनुभूति का संदेश दिया। उन्होंने सुखा निसई (पथरिया, जिला दमोह) को धर्मप्रभावना का प्रमुख केंद्र बनाया, जहां से जन-जन में श्रवण संस्कृति के संस्कार और मोक्षमार्ग का प्रचार-प्रसार हुआ। उनके उपदेशों से समाज को एक नया आध्यात्मिक पंथ प्राप्त हुआ, जो आज “तारण पंथ” के नाम से जाना जाता है।आचार्य तारण स्वामी जी ने पांच मतों के अंतर्गत 14 ग्रंथों की रचना की, जिनमें लगभग 10 हजार श्लोक हैं। इन ग्रंथों में श्रावक की 18 क्रियाओं से लेकर साधु के 28 मूल गुणों तक का विस्तार से वर्णन है। षट्कमल, नाभि कमल, हृदय कमल, कंठ कमल, मुख कमल एवं बिंदु कमल सहित आत्मसाधना की गूढ़ विधियों का प्रतिपादन उन्होंने अपने ग्रंथों में किया। उन्होंने शून्य स्वभाव, शांत स्वभाव एवं सिद्ध स्वभाव अवस्था का विवेचन कर जनमानस को मोक्षमार्ग की दिशा दिखाई।तरण स्वामी जी ने जातिवाद और आडंबर से ऊपर उठकर मानव मात्र को “तू स्वयं भगवान है” का संदेश दिया। उनका कहना था कि जैसे बीज में वृक्ष और चकमक में अग्नि छिपी होती है, वैसे ही आत्मा में परमात्मा विद्यमान है, जिसे साधना द्वारा प्रकट किया जा सकता है। उन्होंने सेमरखेड़ी (सिरोंज, विदिशा) में कठोर तपस्या की तथा निसई मल्हारगढ़ (जिला गुना) में संवत 1572 में देह त्याग कर सर्वार्थ सिद्धि को प्राप्त हुए।
तारण जयंती के अवसर पर विभिन्न स्थानों पर धार्मिक प्रवचन, भजन-कीर्तन तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। इसके साथ ही समाज सेवा के अंतर्गत जरूरतमंदों को कंबल वितरण, विद्यालयों में पुस्तक-कॉपी वितरण, अनाथ आश्रमों में भोजन तथा अस्पतालों में फल वितरण जैसे सेवा कार्य भी किए गए।
श्रद्धालुओं ने आचार्य तारण स्वामी जी से देश में सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते हुए उनके आदर्शों को जीवन में अपनाने का संकल्प लिया।

