डौंडीलोहारा की मौन क्रांति: वह ख़ामोश हुंकार जिसने पूरे तंत्र को झकझोर दिया
– प्रेस रिपोर्टर क्लब बालोद के संयोजन में ऐतिहासिक मौन-प्रदर्शन सफलतापूर्वक संपन्न
बालोद: शालीनता, सादगी और भाईचारे के लिए पहचाने जाने वाला छत्तीसगढ़ का बालोद जिला 27 नवंबर 2025 को लोकतांत्रिक चेतना का प्रतीक बन गया। डौंडीलोहारा का मुख्य चौराहा उस दिन केवल भीड़ का स्थल नहीं था, बल्कि न्याय की राह तकते हज़ारों लोगों का मौन मंच बन गया था।
शिक्षा विभाग में युक्तियुक्तिकरण और तबादलों को लेकर उठते प्रश्न, बीईओ हिमांशु मिश्रा पर लगे गंभीर आरोप, तथा महीनों से चली आ रही प्रशासनिक चुप्पी ने जनता के सब्र को अंतिम सीमा तक पहुँचा दिया था। कार्यालयों में धूल फाँकती फाइलें, निस्तेज जवाबदेही और नियमों की अनदेखी—इन सबने आम लोगों को शांतिपूर्ण किंतु निर्णायक विरोध के लिए प्रेरित किया।
जब शिकायतें अनसुनी रह गईं, तो जनता ने शोर नहीं—मौन चुना।
यह मौन अपने आप में एक घोषणा था कि लोकतंत्र में आवाज़ सिर्फ़ बोलकर ही नहीं, खामोश रहकर भी उठाई जा सकती है।
हज़ारों लोग हाथों में पोस्टर लिए शांत बैठे थे—उनकी आँखों में बस एक ही सवाल चमक रहा था:
“इंसाफ़ कब मिलेगा?”
“कानून सबके लिए बराबर क्यों नहीं?”
इस ऐतिहासिक मौन-पड़ाव का नेतृत्व प्रेस रिपोर्टर क्लब, जिला बालोद ने किया। क्लब ने यह साबित किया कि पत्रकारिता केवल घटनाओं की रिपोर्टिंग नहीं है, बल्कि समाज को जागरूक करने और प्रशासन को जवाबदेह बनाने की जिम्मेदारी भी निभाती है। सहयोग में मधुर साहित्य परिषद बालोद, सर्व अध्यक्ष तहसील इकाई लोहारा, छत्तीसगढ़ गोंडवाना गोंड महासभा और ओबीसी महासभा भी कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे। उनकी एकजुटता इस बात का प्रमाण थी कि न्याय के प्रश्न पर समाज के सभी वर्ग एक साथ खड़े हो सकते हैं।
इस मौन-आंदोलन की विशिष्टता यह थी कि इसमें राजनीति का कोई रंग नहीं था।
भाजपा, कांग्रेस, आप, जेसीसीजे, बसपा, आदिवासी संगठन, व्यापारी वर्ग, महिलाएँ, युवा और ग्रामीण—सभी दलगत सीमाओं से परे एक मंच पर बैठे। यह लोकतंत्र का दुर्लभ दृश्य था जहाँ नागरिकता राजनीति पर भारी पड़ी।
सौंपे गए ज्ञापन में चार स्पष्ट माँगें रखी गईं—
सभी लंबित फाइलें सार्वजनिक की जाएँ
निष्पक्ष जाँच समिति गठित की जाए
समय-सीमा तय कर कार्रवाई हो
हर शिकायत का लिखित जवाब दिया जाए
ये माँगें किसी विद्रोह की नहीं, बल्कि लोकतंत्र के मूल अधिकारों की पुनः प्रस्तुति थीं। पारदर्शिता, नियमपालन और जवाबदेही किसी भी शासन की आधारशिला हैं—और इनके अभाव ने जनता को सड़क पर आने को विवश किया।
डौंडीलोहारा का यह मौन किसी कमजोरी का प्रतीक नहीं, बल्कि सामूहिक शक्ति का उद्घोष था।
कभी-कभी ख़ामोशी भी शोर से ज़्यादा गूंजती है।
अब प्रशासन के पास न तो टालने की गुंजाइश है, न ही बहानों की। जनता ने अपना पक्ष शांतिपूर्वक, संयम के साथ और अत्यंत दृढ़ता से रख दिया है। यदि अब भी ठोस कदम नहीं उठे, तो यह मौन भविष्य में और बड़ी जन-गर्जना का रूप ले सकता है।
27 नवंबर 2025 का यह दिन इतिहास में दर्ज हो चुका है—
इस प्रमाण के साथ कि क्रांति हमेशा नारे नहीं मांगती; कभी-कभी मौन ही सत्ता की नींव को हिला देने की क्षमता रखता है।
— ब्यूरो चीफ, बालोद जिला, छत्तीसगढ़
रोमेद्र कुमार सोनवानी

