सरकारी अस्पतालों को आम जनता की आख़िरी उम्मीद माना जाता है। यहां गरीब, लाचार और असहाय मरीज इस भरोसे के साथ पहुंचते हैं कि उन्हें बिना भेदभाव के इलाज मिलेगा। लेकिन जिले के मेडिकल कॉलेज की पुरुष विंग में सामने आई एक घटना ने इस भरोसे को गहरी चोट पहुंचाई है। यहां एक दिव्यांग मरीज को इलाज देने के बजाय अस्पताल कर्मियों ने रूई, पट्टी और दवा थमा दी और कह दिया – “अपना इलाज खुद कर लो।” यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि उस संवेदनहीनता की कहानी है जो धीरे-धीरे सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में घर करती जा रही है।
अस्पताल की व्यवस्थाओं की पड़ताल के दौरान जो दृश्य सामने आया, वह किसी भी जिम्मेदार व्यवस्था के लिए शर्मनाक है। अस्पताल में डॉक्टरों के बैठने का समय सुबह 8 बजे निर्धारित है, लेकिन सुबह 9:30 बजे तक कई कमरों में डॉक्टर और स्टाफ नदारद मिले। कमरों के बाहर मरीज दर्द से कराहते हुए डॉक्टरों का इंतजार करते दिखाई दिए। कोई जमीन पर बैठा था, तो कोई परिजन के सहारे खड़ा होकर इलाज की आस लगाए हुए था। इसी दौरान अस्पताल के गलियारे में एक बेहद मार्मिक दृश्य देखने को मिला।
करीब दो साल पहले एक हादसे में अपना एक पैर गंवा चुका एक दिव्यांग मरीज, जिसका दूसरा पैर भी घायल था, व्हीलचेयर के सहारे अस्पताल में इधर-उधर भटकता नजर आया। जब उसने डॉक्टर से इलाज की गुहार लगाई तो उसे उचित उपचार देने के बजाय रूई, पट्टी और दवा पकड़ा दी गई और खुद ही पट्टी करने के लिए कह दिया गया। जिस व्यक्ति का एक पैर कटा हुआ हो और दूसरा घायल हो, उससे यह कहना कि वह अपना इलाज खुद कर ले — क्या यह चिकित्सा व्यवस्था की जिम्मेदारी से मुंह मोड़ना नहीं है? यह घटना सिर्फ एक मरीज की पीड़ा नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है जिसमें संवेदनशीलता कहीं खोती जा रही है।
जब इस मामले में मुख्य चिकित्सा अधीक्षक (सीएमएस) रमाकांत सागर से फोन पर बात की गई तो उन्होंने मरीज को कमरा नंबर 60 में भेजने की बात कही। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जिस मरीज का एक पैर कटा हुआ है और दूसरा घायल है, वह अस्पताल के एक कमरे से दूसरे कमरे तक कैसे पहुंचेगा? गौरतलब है कि बीते दिन एक हिंदू संगठन ने भी मेडिकल कॉलेज के सीएमएस पर लापरवाही के गंभीर आरोप लगाए थे। मामले को गंभीरता से लेते हुए मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने भी सीएमएस के खिलाफ कार्रवाई के लिए शासन को पत्र भेज दिया है।
मामले पर जिलाधिकारी ज्ञानेंद्र सिंह ने कहा कि, “मैं अभी इस मामले को संज्ञान में लेता हूं। अगर इस तरह की लापरवाही हो रही है तो यह बेहद गंभीर है। मरीज का उपचार हर हाल में होना चाहिए।”
मुख्य चिकित्सा अधिकारी आलोक शर्मा ने कहा कि, “यह कृत्य बेहद शर्मनाक है। मैंने सीएमएस के खिलाफ कार्रवाई के लिए शासन को पत्र भेज दिया है। यदि ड्यूटी के समय डॉक्टर उपस्थित नहीं रहते हैं तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।”
सरकारी अस्पतालों में बेहतर इलाज के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जब एक विकलांग मरीज को भी इलाज के लिए भटकना पड़े, तो यह पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था की संवेदनशीलता और जवाबदेही पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।यह घटना केवल एक दिव्यांग मरीज की पीड़ा नहीं है। यह उस व्यवस्था की तस्वीर है जिसमें दावे बड़े हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कमजोर है। जब अस्पतालों में ही मरीजों को सम्मान और इलाज नहीं मिलेगा, तो आम आदमी आखिर किस पर भरोसा करेगा?
अब नजर इस बात पर है कि प्रशासन इस मामले में दोषियों के खिलाफ कितनी सख्त कार्रवाई करता है और क्या इससे सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में कोई सुधार देखने को मिलेगा।
