बांदा। शिक्षा केवल ज्ञानार्जन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की आधारशिला है। इसी विचार को केंद्र में रखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा संचालित “स्कूल चलो अभियान” का शुभारंभ आज सजीव प्रसारण के माध्यम से हुआ, जिसका साक्षी बांदा का महर्षि बामदेव सभागार बना। कलेक्ट्रेट परिसर में आयोजित इस कार्यक्रम में दीप प्रज्वलन के साथ न केवल औपचारिक शुरुआत हुई, बल्कि शिक्षा के प्रति एक व्यापक सामाजिक प्रतिबद्धता का भी उद्घोष हुआ।वाराणसी से प्रसारित अपने संबोधन में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्पष्ट शब्दों में कहा— “यह यशस्वी बनने का समय है, हम सभी इस राष्ट्रीय अभियान का हिस्सा बनें और हर बच्चे को स्कूल तक ले जाएं।” उनका यह कथन केवल अपील नहीं, बल्कि एक नैतिक आग्रह था, जो यह रेखांकित करता है कि किसी एक बच्चे की साक्षरता, पूरे समाज की चेतना को आलोकित करती है। उन्होंने यह भी बताया कि बेसिक शिक्षा परिषद के विद्यार्थियों के लिए सरकार द्वारा यूनिफॉर्म, बैग, पुस्तकें, जूते, मोजे और स्वेटर जैसी आवश्यक सुविधाएं निःशुल्क उपलब्ध कराई जा रही हैं—यह व्यवस्था शिक्षा को सुलभ और समावेशी बनाने की दिशा में ठोस प्रयास का प्रतीक है।कार्यक्रम की मुख्य अतिथि विधायक ओममणी वर्मा ने इसे “शिक्षा क्रांति की दिशा में निर्णायक कदम” बताते हुए संकल्प व्यक्त किया कि नरैनी सहित पूरे बांदा जनपद में कोई भी बच्चा, विशेषकर बालिकाएँ, शिक्षा से वंचित न रहें। उनका यह कथन इस सामाजिक यथार्थ को स्वीकार करता है कि शिक्षा का वास्तविक विस्तार तब संभव है, जब समाज के हर वर्ग तक इसकी पहुँच सुनिश्चित हो।
मुख्य विकास अधिकारी अजय कुमार पाण्डेय ने अभियान को “मिशन मोड” में संचालित करने की बात कही। उनका यह दृष्टिकोण इस तथ्य को रेखांकित करता है कि केवल योजनाओं की घोषणा पर्याप्त नहीं, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए प्रशासनिक सक्रियता और जनभागीदारी अनिवार्य है। वहीं, जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी अव्यक्त राम तिवारी ने 100% नामांकन के लक्ष्य को सामने रखते हुए शिक्षकों, अभिभावकों और समाज के सामूहिक सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया।
इस आयोजन की विशेषता यह रही कि इसमें केवल अधिकारी या जनप्रतिनिधि ही नहीं, बल्कि शिक्षक, अभिभावक और विद्यार्थी भी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे—जो यह संकेत देता है कि “स्कूल चलो अभियान” अब एक सरकारी कार्यक्रम भर नहीं, बल्कि जनआंदोलन का रूप लेने की ओर अग्रसर है।अंततः यह पहल हमें यही सोचने को विवश करती है कि शिक्षा का अधिकार तभी सार्थक होगा, जब वह व्यवहार में भी समान रूप से सुलभ हो। “हर बच्चा स्कूल, हर स्कूल गुणवत्तापूर्ण”—यह नारा तभी जीवंत होगा, जब संकल्प, संवेदना और सहभागिता तीनों एक साथ आगे बढ़ें।
