बांदा जिलाधिकारी अमित आसेरी ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली की उस कमजोर कड़ी पर सीधे प्रहार किया है, जहां शिकायतों का निस्तारण केवल कागजी औपचारिकता बनकर रह गया है। कार्यालय ज्ञापन के माध्यम से जिलाधिकारी ने स्पष्ट किया कि शासन की मंशा केवल फाइलों के बंद होने की नहीं, बल्कि जनता को वास्तविक न्याय और संतुष्टि दिलाने की है।दरअसल, जनसुनवाई लोकतंत्र की वह खिड़की है, जहां आम आदमी अपनी पीड़ा लेकर प्रशासन के दरवाजे पर पहुंचता है। लेकिन जब उसकी शिकायत बिना जांच, बिना संवाद और बिना संवेदनशीलता के केवल एक आख्या लगाकर निस्तारित कर दी जाती है, तब व्यवस्था पर जनता का विश्वास कमजोर होने लगता है। जिलाधिकारी ने इसी चिंताजनक प्रवृत्ति पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि कई अधिकारी अधीनस्थ कर्मचारियों की रिपोर्ट को बिना परीक्षण सीधे उच्चाधिकारियों को भेज देते हैं, जो न केवल गैर-जिम्मेदाराना रवैया है बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
ज्ञापन में यह भी रेखांकित किया गया कि शिकायतों की जांच शिकायतकर्ता की उपस्थिति में की जाए और उसके बयान दर्ज किए जाएं। यह निर्देश केवल प्रक्रिया नहीं, बल्कि प्रशासन को संवेदनशील और पारदर्शी बनाने की पहल है। क्योंकि किसी भी शिकायत का वास्तविक सत्य वही व्यक्ति बता सकता है, जिसने समस्या को झेला हो।जिलाधिकारी ने अधिकारियों को यह भी याद दिलाया कि शासन लगातार गुणवत्तापूर्ण निस्तारण और शिकायतकर्ताओं से फीडबैक लेने पर जोर दे रहा है, लेकिन कई स्तरों पर इन निर्देशों की अनदेखी की जा रही है। ऐसे में यह आदेश प्रशासनिक मशीनरी को चेतावनी भी है और सुधार का अवसर भी।स्पष्ट है कि यदि शिकायतों का निस्तारण केवल “फाइल निपटाने” की मानसिकता से होगा, तो जनता और प्रशासन के बीच भरोसे की खाई और गहरी होगी। लेकिन यदि जांच निष्पक्ष, संवाद आधारित और जवाबदेह होगी, तो यही प्रक्रिया सुशासन की मजबूत नींव बन सकती है।
