डा. भीमराव अंबेडकर संवैधानिक महासंघ चालीसा
(जय भीम का ऊँचा ध्वज, फैले चारों ओर।
महासंघ का नाद गूंजे, भारत भू पर शोर॥)
दोहे (आरंभ)
जय भीम का उच्च ध्वज, लहराए संसार।
महासंघ का नाम गूंजे, भारत हो साकार॥
संविधान का रक्षक यह, महासंघ महान।
भीमराव के पथ चले, दे भारत पहचान॥
चौपाइयाँ (मुख्य भाग)
जय भीम बोले, गूंजे नारा।
न्याय समानता धर्म हमारा॥
बंधुता का दीप जलाए।
संविधान की राह दिखाए॥
जाति-भेद की बेड़ी तोड़ी।
ज्ञान दिया हर जन की झोली॥
श्रमिक, किसान, दलित, निराश।
सबको दी नव दिशा, प्रकाश॥
नारी को भी मान दिलाया।
शिक्षा से सम्मान बढ़ाया॥
अंधकार जब छाया भारी।
भीम बने थे ज्योति-धारी॥
महासंघ का ध्येय यही है।
मानवता की जीत सही है॥
भीम विचार अमर हो जाएं।
भारत में समभाव बढ़ाएं॥
संविधान का गान सुनाएं।
जन-जन को अधिकार बताएं॥
न्याय बिना जग ठहर न पाए।
भीमपथ हर मन अपनाए॥
लोकतंत्र की नींव भीम ने डाली।
जन-सत्ता की ज्योति संभाली॥
संविधान में जोत जलाई।
समता की परिभाषा पाई॥
श्रमिक-किसान मिलें सब भाई।
भ्रष्टाचार की जड़ उखड़ाई॥
सत्य और नीति बनें हमारा।
महासंघ हो दीपक प्यारा॥
शिक्षा-संगठन-संघर्ष नारा।
भीम विचार अमर उजियारा॥
संविधान का धर्म निभाना।
जनसेवा को पुण्य बताना॥
दलित, पिछड़े संग उठ जाओ।
भीमपथ पर चलो सजाओ॥
नवयुग का निर्माण यही है।
संविधान का मान सही है॥
राजनीति में नीति आए।
जन की बात सदा सुनी जाए॥
महासंघ का कर्म निराला।
भीमपथ का दीप उजाला॥
न्याय-समानता के संदेश।
गूंजें भारत भू पर विशेष॥
संविधान की छाया प्यारी।
भीम की यह विरासत सारी॥
दोहे (अंत)
संविधान का धर्म है, सत्य और न्याय विचार।
महासंघ का कर्म है, सेवा में संसार॥
जय भीम जय संविधान, जय मानवता नाद।
महासंघ का गान बजे, भारत हो आबाद॥
संविधान वंदना (अंतिम घोष)
जय संविधान! जय भीम महान!
न्याय-समानता, यही हमारी जान॥
महासंघ का यह प्रण पवित्र,
मानवता का सदा हो चित्र॥

