तुम क्या कर सकते हो?
अगर बदल सकते हो,
तो सबसे पहले खुद को बदलो।
अपने भीतर बैठे डर को हराओ,
अपने सपनों को जगाओ,
और उस आग को पहचानो
जो तुम्हें हारने नहीं देती।
अगर तुम चल सकते हो,
तो उन रास्तों पर चलो
जहाँ लोग थक कर रुक गए।
अगर तुम बोल सकते हो,
तो उन लोगों के लिए बोलो
जिनकी आवाज़ दबा दी गई।
अगर तुम लिख सकते हो,
तो उन पर लिखो
जिनके हिस्से में सिर्फ़ दर्द आया।
उन बच्चों पर लिखो
जो भूखे पेट सो जाते हैं।
उन मज़दूरों पर लिखो
जो अपने ही शहर में अजनबी बन जाते हैं।
उन लोगों पर लिखो
जिनकी चीखें
भीड़ के शोर में खो जाती हैं।
अगर तुम पढ़ सकते हो,
तो सिर्फ़ किताबें मत पढ़ो,
लोगों के संघर्ष पढ़ो।
B. R. Ambedkar को पढ़ो
जिन्होंने अपमान सहकर भी
देश को संविधान दिया।
Bhagat Singh को पढ़ो
जिन्होंने हँसते-हँसते
अपनी ज़िंदगी देश को दे दी।
Savitribai Phule को पढ़ो
जिन्होंने समाज के पत्थरों के बीच
शिक्षा का दीप जलाया।
A. P. J. Abdul Kalam को पढ़ो
जिन्होंने सिखाया
कि छोटे घरों से भी बड़े सपने जन्म लेते हैं।
अगर तुम जीत सकते हो,
तो ऐसी जीत जीतना
जिससे सिर्फ़ तुम्हारा नहीं,
पूरे देश का सिर ऊँचा हो।
मैदान में खेलो,
विज्ञान में आगे बढ़ो,
नई खोज करो,
नई सोच पैदा करो।
अगर तुम पूछ सकते हो,
तो सवाल पूछो।
उनसे पूछो
जो कुर्सियों पर बैठे हैं।
पूछो कि गरीब अब भी भूखा क्यों है।
पूछो कि मेहनत करने वाला
हमेशा पीछे क्यों रह जाता है।
पूछो कि इंसान को
इंसान समझना इतना कठिन क्यों है।
और याद रखो
Ravish Kumar की वो बात—
“अगर आपके बगल वाले कमरे में आग लगी हो,
तो क्या आप शांत रह सकते हैं?”
आपकी बगल वाले कमरे में लाशों का ढेर लगा हो तो
क्या आप शांति से दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो
आपसे मुझे कुछ नहीं
नहीं।
क्योंकि इंसान वही है
जो दूसरों का दर्द महसूस करे।
जो सिर्फ़ अपने लिए नहीं,
दूसरों के लिए भी जिए।
अगर तुम कुछ नहीं कर सकते,
तो कम से कम
उन लोगों का हौसला बनो
जो दुनिया बदलने की कोशिश कर रहे हैं।
क्योंकि हर बदलाव
पहले एक छोटे कदम से शुरू होता है।
भारत सिर्फ़ नक्शे पर बना
एक टुकड़ा ज़मीन नहीं है।
भारत उन करोड़ों लोगों की उम्मीद है
जो हर सुबह
एक बेहतर कल का सपना देखते हैं।
इसलिए उठो।
अपने सपनों के लिए उठो।
अपने लोगों के लिए उठो।
अपने देश के लिए उठो।
और ऐसा कुछ करो
कि आने वाला समय
तुम्हारा नाम याद रखे।
— लेखक: गौरव सिद्धार्थ
